माँ बगलामुखी कौन हैं
माँ बगलामुखी दस महाविद्याओं में आठवीं महाविद्या मानी जाती हैं। पीले रंग से जुड़े होने के कारण उन्हें पीताम्बरा देवी भी कहा जाता है। मान्यता है कि वे वाणी, शत्रु-बाधा और संकटों को स्तंभित कर अपने भक्तों की रक्षा करती हैं।
कथा के अनुसार, जगत को एक भीषण तूफ़ान से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने हरिद्रा सरोवर के पास तपस्या की और वहीं माँ प्रकट हुईं। एक अन्य कथा में मदन नामक असुर को वरदान मिला था कि वह जो कहे वही हो जाए, तब माँ ने उसकी वाणी को स्तंभित कर दिया। ये कथाएँ अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं में भिन्न रूपों में मिलती हैं।
मंदिर की कथा और मान्यता
लोक-मान्यता है कि महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण की सलाह पर युधिष्ठिर ने युद्ध में विजय के लिए यहाँ माँ की उपासना की और प्रतिमा की स्थापना की। इस बात का कोई लिखित या पुरातात्विक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, यह श्रद्धा और परंपरा की बात है।
बगलामुखी के तीन प्राचीन माने जाने वाले स्थलों में नलखेड़ा, दतिया और कांगड़ा (बनखंडी) की गिनती की जाती है।
“यहाँ माँ त्रिशक्ति स्वरूप में विराजमान मानी जाती हैं।”
पावन मान्यता एवं महात्म्य
मंदिर का स्वरूप
मान्यता के अनुसार यहाँ की प्रतिमा स्वयंभू है और तीन मुखों वाली मानी जाती है, इसलिए माँ को त्रिशक्ति माता भी कहा जाता है। माँ बगलामुखी के साथ माँ लक्ष्मी और माँ सरस्वती की उपस्थिति भी मानी जाती है।
मंदिर परिसर में भैरव, हनुमान और श्रीकृष्ण के विग्रह भी स्थापित हैं। मंदिर लखुन्दर नदी के तट पर स्थित है।
साधना और हवन परंपरा
यह स्थान तंत्र-साधना का केंद्र माना जाता है। यहाँ श्रद्धालु विजय और मनोकामना की भावना से यज्ञ, हवन और पूजा-पाठ कराते हैं। मिर्ची हवन यहाँ की प्रसिद्ध परंपराओं में गिना जाता है। अनुष्ठान के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु यहाँ आते हैं।
प्रमुख पर्व
वैशाख मास में मनाई जाने वाली बगलामुखी जयंती यहाँ का सबसे प्रमुख पर्व है। नवरात्रि में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुँचते हैं।


